सूरह अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन (धोखाधड़ी करने वाले) سُورَة المطففين

सूरह अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन क़ुरआन की तिरासीवीं सूरह है, जो मक्का में अवतरित हुई। इसमें 36 आयतें हैं और इसमें व्यापारिक धोखाधड़ी, न्याय और क़यामत के दिन की स्थिति पर चर्चा की गई है।

सूरह अल-मुतफ़्फ़िफ़ीन (घटतौल करने वाले) — سُورَةُ المطففين

जिसे यह भी कहा जाता है: Wayl li al-Muṭaffifīn (नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए विनाश), al-Taṭfīf (कम देना)

الَّذِينَ إِذَا اكْتَالُوا عَلَى النَّاسِ يَسْتَوْفُونَ ٢ i

83:२

जो नापकर लोगों पर नज़र जमाए हुए लेते हैं तो पूरा-पूरा लेते हैं, (२)

وَمَا يُكَذِّبُ بِهِ إِلَّا كُلُّ مُعْتَدٍ أَثِيمٍ ١٢ i

83:१२

और उसे तो बस प्रत्येक वह क्यक्ति ही झूठलाता है जो सीमा का उल्लंघन करनेवाला, पापी है (१२)

إِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِ آيَاتُنَا قَالَ أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ ١٣ i

83:१३

जब हमारी आयतें उसे सुनाई जाती है तो कहता है, "ये तो पहले की कहानियाँ है।" (१३)

كَلَّا ۖ بَلْ ۜ رَانَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ مَا كَانُوا يَكْسِبُونَ ١٤ i

83:१४

कुछ नहीं, बल्कि जो कुछ वे कमाते रहे है वह उनके दिलों पर चढ़ गया है (१४)

كَلَّا إِنَّهُمْ عَنْ رَبِّهِمْ يَوْمَئِذٍ لَمَحْجُوبُونَ ١٥ i

83:१५

कुछ नहीं, अवश्य ही वे उस दिन अपने रब से ओट में होंगे, (१५)

كَلَّا إِنَّ كِتَابَ الْأَبْرَارِ لَفِي عِلِّيِّينَ ١٨ i

83:१८

कुछ नही, निस्संदेह वफ़ादार लोगों का काग़ज़ 'इल्लीयीन' (उच्च श्रेणी के लोगों) में है।- (१८)

تَعْرِفُ فِي وُجُوهِهِمْ نَضْرَةَ النَّعِيمِ ٢٤ i

83:२४

उनके चहरों से तुम्हें नेमतों की ताज़गी और आभा को बोध हो रहा होगा, (२४)

خِتَامُهُ مِسْكٌ ۚ وَفِي ذَٰلِكَ فَلْيَتَنَافَسِ الْمُتَنَافِسُونَ ٢٦ i

83:२६

मुहर उसकी मुश्क ही होगी - जो लोग दूसरी पर बाज़ी ले जाना चाहते हो वे इस चीज़ को प्राप्त करने में बाज़ी ले जाने का प्रयास करे - (२६)

عَيْنًا يَشْرَبُ بِهَا الْمُقَرَّبُونَ ٢٨ i

83:२८

हाल यह है कि वह एक स्रोत है, जिसपर बैठकर सामीप्य प्राप्त लोग पिएँगे (२८)

إِنَّ الَّذِينَ أَجْرَمُوا كَانُوا مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا يَضْحَكُونَ ٢٩ i

83:२९

जो अपराधी है वे ईमान लानेवालों पर हँसते थे, (२९)

وَإِذَا مَرُّوا بِهِمْ يَتَغَامَزُونَ ٣٠ i

83:३०

और जब उनके पास से गुज़रते तो आपस में आँखों और भौंहों से इशारे करते थे, (३०)

وَإِذَا انْقَلَبُوا إِلَىٰ أَهْلِهِمُ انْقَلَبُوا فَكِهِينَ ٣١ i

83:३१

और जब अपने लोगों की ओर पलटते है तो चहकते, इतराते हुए पलटते थे, (३१)

فَالْيَوْمَ الَّذِينَ آمَنُوا مِنَ الْكُفَّارِ يَضْحَكُونَ ٣٤ i

83:३४

तो आज ईमान लानेवाले, इनकार करनेवालों पर हँस रहे हैं, (३४)

هَلْ ثُوِّبَ الْكُفَّارُ مَا كَانُوا يَفْعَلُونَ ٣٦ i

83:३६

क्या मिल गया बदला इनकार करनेवालों को उसका जो कुछ वे करते रहे है? (३६)