सूरह अल-फुरक़ान (भेद करने वाला — الفرقان) (आयत 28)

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25 अल-फुरक़ान(الفرقان), आयत २८

يَا وَيْلَتَىٰ لَيْتَنِي لَمْ أَتَّخِذْ فُلَانًا خَلِيلًا 28 ٢٨

हाय मेरा दुर्भाग्य! काश, मैंने अमुक व्यक्ति को मित्र न बनाया होता! (२८)

तफ़सीर
तथा वह बड़े अफसोस के साथ अपने आपको अभिशाप देते हुए कहेगा : हाय मेरा विनाश! काश मैंने फलाँ काफ़िर व्यक्ति को मित्र न बनाया होता।

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