सूरह अल-फुरक़ान (भेद करने वाला — الفرقان) (आयत 4)

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25 अल-फुरक़ान(الفرقان), आयत ४

وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا إِنْ هَٰذَا إِلَّا إِفْكٌ افْتَرَاهُ وَأَعَانَهُ عَلَيْهِ قَوْمٌ آخَرُونَ ۖ فَقَدْ جَاءُوا ظُلْمًا وَزُورًا 4 ٤

जिन लोगों ने इनकार किया उनका कहना है, "यह तो बस मनघड़ंत है जो उसने स्वयं ही घड़ लिया है। और कुछ दूसरे लोगों ने इस काम में उसकी सहायता की है।" वे तो ज़ुल्म और झूठ ही के ध्येय से आए (४)

तफ़सीर
और अल्लाह एवं उसके रसूल के साथ कुफ़्र करने वालों ने कहा : यह क़ुरआन केवल एक झूठ है, जिसे मुह़म्मद ने गढ़ लिया है और झूठमूठ अल्लाह से संबद्ध कर दिया है। इसे गढ़ने में अन्य लोगों ने भी उसका साथ दिया है। निश्चय इन काफ़िरों ने एक असत्य बात गढ़ी है। क्योंकि क़ुरआन अल्लाह की वाणी है। कोई इनसान या जिन्न इस तरह की वाणी कदापि नहीं ला सकता।

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