सूरह अज़-ज़ुमर (झुंड — الزمر) (आयत 56)

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39 अज़-ज़ुमर(الزمر), आयत ५६

أَنْ تَقُولَ نَفْسٌ يَا حَسْرَتَا عَلَىٰ مَا فَرَّطْتُ فِي جَنْبِ اللَّهِ وَإِنْ كُنْتُ لَمِنَ السَّاخِرِينَ 56 ٥٦

कहीं ऐसा न हो कि कोई व्यक्ति कहने लगे, "हाय, अफ़सोस उसपर! जो कोताही अल्लाह के हक़ में मैंने की। और मैं तो परिहास करनेवालों मं ही सम्मिलित रहा।" (५६)

तफ़सीर
यह काम करते रहो। डर है कि क़ियामत के दिन कोई व्यक्ति मारे अफ़सोस के यह न कहे कि अफ़सोस है उस कोताही पर, जो मैंने कुफ़्र और गुनाह पर क़ायम रहकर अल्लाह के हक़ में की है और ईमान वालों तथा आज्ञाकारियों का मज़ाक उड़ाया है।

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