सूरह अर-रहमान (परम दयालु — الرحمن) (आयत 4)

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55 अर-रहमान(الرحمن), आयत ४

عَلَّمَهُ الْبَيَانَ 4 ٤

उसे बोलना सिखाया; (४)

तफ़सीर
उसे सिखाया कि अपने दिल की बात को मौखिक और लिखित रूप में कैसे व्यक्त करे।

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