सूरह अल-मुम्तहिना (जांचने वाली — الممتحنة) (आयत 2)

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60 अल-मुम्तहिना(الممتحنة), आयत २

إِنْ يَثْقَفُوكُمْ يَكُونُوا لَكُمْ أَعْدَاءً وَيَبْسُطُوا إِلَيْكُمْ أَيْدِيَهُمْ وَأَلْسِنَتَهُمْ بِالسُّوءِ وَوَدُّوا لَوْ تَكْفُرُونَ 2 ٢

यदि वे तुम्हें पा जाएँ तो तुम्हारे शत्रु हो जाएँ और कष्ट पहुँचाने के लिए तुमपर हाथ और ज़बान चलाएँ। वे तो चाहते है कि काश! तुम भी इनकार करनेवाले हो जाओ (२)

तफ़सीर
यदि वे तुम्हें (कहीं) पा जाएँ, तो अपने दिलों में छिपाई हुई दुश्मनी का प्रदर्शन करेंगे, और कष्ट पहुँचाने तथा मार पीट करने के लिए तुम्हारी ओर अपने हाथ बढ़ाएँगे, और गाली-गलौज करने तथा बुरा-भला कहने के लिए अपनी ज़बानों को आज़ाद छोड़ देंगे, और इस बात की कामना करेंगे कि काश तुम भी अल्लाह और उसके रसूल का इनकार करके उनके जैसे हो जाओ।

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