सूरह अल-फ़ज्र (प्रभात — الفجر) (आयत 17)

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89 अल-फ़ज्र(الفجر), आयत १७

كَلَّا ۖ بَلْ لَا تُكْرِمُونَ الْيَتِيمَ 17 ١٧

कदापि नहीं, बल्कि तुम अनाथ का सम्मान नहीं करते, (१७)

तफ़सीर
हरगिज़ नहीं, यह मामला ऐसा नहीं है, जैसा कि इस व्यक्ति ने कल्पना की है कि नेमत बंदे से अल्लाह के खुश होने का प्रमाण है और सज़ा बंदे से अल्लाह के नाराज़ होने का प्रमाण है। बल्कि, वास्तविकता यह है कि अल्लाह ने तुम्हें जो जीविका प्रदान की है, तुम उससे अनाथ का सम्मान नहीं करते हो।

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