सूरह अल-बलद (शहर) سُورَة البلد

सूरह अल-बलद क़ुरआन की नब्बेवीं सूरह है, जो मक्का में अवतरित हुई। इसमें 20 आयतें हैं और इसमें मानवता, संघर्ष और कठिनाइयों का सामना करने के बारे में चर्चा की गई है।

सूरह अल-बलद (शहर) — سُورَةُ البلد

जिसे यह भी कहा जाता है: Lā Uqsimu bi-Hādhā al-Balad (मैं इस नगर की क़सम खाता हूँ)

لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ فِي كَبَدٍ ٤ i

90:४

निस्संदेह हमने मनुष्य को पूर्ण मशक़्क़त (अनुकूलता और सन्तुलन) के साथ पैदा किया (४)

فَلَا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَ ١١ i

90:११

किन्तु वह तो हुमककर घाटी में से गुजंरा ही नहीं और (न उसने मुक्ति का मार्ग पाया) (११)

ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ ١٧ i

90:१७

फिर यह कि वह उन लोगों में से हो जो ईमान लाए और जिन्होंने एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की , और एक-दूसरे को दया की ताकीद की (१७)

وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا هُمْ أَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ ١٩ i

90:१९

रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयातों का इनकार किया, वे दुर्भाग्यशाली लोग है (१९)