सूरह अश-शम्स (सूर्य) سُورَة الشمس

सूरह अश-शम्स क़ुरआन की इकतालीसवीं सूरह है, जो मक्का में अवतरित हुई। इसमें 15 आयतें हैं और इसमें सूर्य, उसकी रोशनी और मानवता के प्रति उसकी जिम्मेदारी पर चर्चा की गई है।

सूरह अश-शम्स (सूरज) — سُورَةُ الشمس

जिसे यह भी कहा जाता है: Wa-al-Shamsi Wa-Ḍuḥāhā (सूरज और उसकी रोशनी की क़सम)

فَقَالَ لَهُمْ رَسُولُ اللَّهِ نَاقَةَ اللَّهِ وَسُقْيَاهَا ١٣ i

91:१३

तो अल्लाह के रसूल ने उनसे कहा, "सावधान, अल्लाह की ऊँटनी और उसके पिलाने (की बारी) से।" (१३)

فَكَذَّبُوهُ فَعَقَرُوهَا فَدَمْدَمَ عَلَيْهِمْ رَبُّهُمْ بِذَنْبِهِمْ فَسَوَّاهَا ١٤ i

91:१४

किन्तु उन्होंने उसे झुठलाया और उस ऊँटनी की कूचें काट डाली। अन्ततः उनके रब ने उनके गुनाह के कारण उनपर तबाही डाल दी और उन्हें बराबर कर दिया (१४)