वे बहरे हैं, गूँगें हैं, अन्धे हैं, अब वे लौटने के नहीं (१८)
तफ़सीर
वे बहरे हैं, सत्य को स्वीकार करने की नीयत से नहीं सुनते। वे गूँगे हैं, सत्य नहीं बोलते हैं। (वे) सत्य को देखने से अंधे हैं। इसलिए वे अपनी पथभ्रष्टता से वापस नहीं लौटते।
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