सूरह अल-क़मर (चाँद — القمر) (आयत 30)
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अल-क़मर(القمر), आयत ३०
فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ
फिर कैसी रही मेरी यातना और मेरे डरावे? (३०)
तफ़सीर
तो (ऐ मक्का वालो!) ग़ौर करो कि उनके लिए मेरी यातना कैसी थी?! और मेरा उनकी यातना से अन्य लोगों को सावधान करना कैसा था?!
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