सूरह अल-बलद (शहर) — سُورَةُ البلد
لَا أُقْسِمُ بِهَٰذَا الْبَلَدِ i
▶ 90:1सुनो! मैं क़सम खाता हूँ इस नगर (मक्का) की - (१)
وَأَنْتَ حِلٌّ بِهَٰذَا الْبَلَدِ i
▶ 90:2हाल यह है कि तुम इसी नगर में रह रहे हो - (२)
وَوَالِدٍ وَمَا وَلَدَ i
▶ 90:3और बाप और उसकी सन्तान की, (३)
لَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنْسَانَ فِي كَبَدٍ i
▶ 90:4निस्संदेह हमने मनुष्य को पूर्ण मशक़्क़त (अनुकूलता और सन्तुलन) के साथ पैदा किया (४)
أَيَحْسَبُ أَنْ لَنْ يَقْدِرَ عَلَيْهِ أَحَدٌ i
▶ 90:5क्या वह समझता है कि उसपर किसी का बस न चलेगा? (५)
يَقُولُ أَهْلَكْتُ مَالًا لُبَدًا i
▶ 90:6कहता है कि "मैंने ढेरो माल उड़ा दिया।" (६)
أَيَحْسَبُ أَنْ لَمْ يَرَهُ أَحَدٌ i
▶ 90:7क्या वह समझता है कि किसी ने उसे देखा नहीं? (७)
أَلَمْ نَجْعَلْ لَهُ عَيْنَيْنِ i
▶ 90:8क्या हमने उसे नहीं दी दो आँखें, (८)
وَلِسَانًا وَشَفَتَيْنِ i
▶ 90:9और एक ज़बान और दो होंठ? (९)
وَهَدَيْنَاهُ النَّجْدَيْنِ i
▶ 90:10और क्या ऐसा नहीं है कि हमने दिखाई उसे दो ऊँचाइयाँ? (१०)
فَلَا اقْتَحَمَ الْعَقَبَةَ i
▶ 90:11किन्तु वह तो हुमककर घाटी में से गुजंरा ही नहीं और (न उसने मुक्ति का मार्ग पाया) (११)
وَمَا أَدْرَاكَ مَا الْعَقَبَةُ i
▶ 90:12और तुम्हें क्या मालूम कि वह घाटी क्या है! (१२)
فَكُّ رَقَبَةٍ i
▶ 90:13किसी गरदन का छुड़ाना (१३)
أَوْ إِطْعَامٌ فِي يَوْمٍ ذِي مَسْغَبَةٍ i
▶ 90:14या भूख के दिन खाना खिलाना (१४)
يَتِيمًا ذَا مَقْرَبَةٍ i
▶ 90:15किसी निकटवर्ती अनाथ को, (१५)
أَوْ مِسْكِينًا ذَا مَتْرَبَةٍ i
▶ 90:16या धूल-धूसरित मुहताज को; (१६)
ثُمَّ كَانَ مِنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَتَوَاصَوْا بِالصَّبْرِ وَتَوَاصَوْا بِالْمَرْحَمَةِ i
▶ 90:17फिर यह कि वह उन लोगों में से हो जो ईमान लाए और जिन्होंने एक-दूसरे को धैर्य की ताकीद की , और एक-दूसरे को दया की ताकीद की (१७)
أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ i
▶ 90:18वही लोग है सौभाग्यशाली (१८)
وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِنَا هُمْ أَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ i
▶ 90:19रहे वे लोग जिन्होंने हमारी आयातों का इनकार किया, वे दुर्भाग्यशाली लोग है (१९)
عَلَيْهِمْ نَارٌ مُؤْصَدَةٌ i
▶ 90:20उनपर आग होगी, जिसे बन्द कर दिया गया होगा (२०)